खैरागढ़ में फाइलों पर रुका विकास, ठेकेदार परेशान, जनता प्यासी
शशिकांत सनसनी | विशेष रिपोर्ट | B4News
राजनांदगांव/खैरागढ़।
देश के प्रधानमंत्री Narendra Modi लगातार “हर घर जल” मिशन को देश के अंतिम व्यक्ति तक पहुंचाने की बात कर रहे हैं। केंद्र सरकार की महत्वाकांक्षी जल जीवन मिशन योजना का उद्देश्य है कि हर ग्रामीण परिवार तक स्वच्छ पेयजल पहुंचे और गांवों की महिलाओं को पानी के लिए संघर्ष न करना पड़े।
लेकिन खैरागढ़-छुईखदान-गंडई जिले में इस मिशन की हकीकत कुछ और ही कहानी बयां कर रही है। यहां लोक स्वास्थ्य यांत्रिकी (PHE) विभाग में पदस्थ अधिकारी प्रदीप खालको पर गंभीर आरोप लग रहे हैं कि उन्होंने इस योजना को विकास का माध्यम नहीं, बल्कि कथित रूप से “वसूली तंत्र” बना दिया है।
स्थानीय ठेकेदारों, विभागीय सूत्रों और ग्रामीणों के बीच चर्चा है कि बिना “विशेष कृपा” के फाइल आगे नहीं बढ़ती, भुगतान अटकता है और नए-नए तकनीकी नियमों के नाम पर काम रोके जाते हैं।
प्रधानमंत्री के सपने पर ‘कमीशन’ का ग्रहण?
प्रधानमंत्री का सपना था—“हर घर जल”
लेकिन खैरागढ़ में नया नारा सुनाई दे रहा है—
“जब तक न चढ़ेगा चढ़ावा, फाइल को नहीं मिलेगा बढ़ावा!”
सूत्रों का दावा है कि विभागीय कार्यों में ड्राइंग अप्रूवल, FHTC मार्किंग, पाइपलाइन निरीक्षण, रंग-कोडिंग और तकनीकी क्लियरेंस जैसे बिंदुओं को कथित रूप से दबाव बनाने के औजार की तरह इस्तेमाल किया जा रहा है।
काम पूरा होने के बावजूद बिल पास नहीं हो रहे, भुगतान अटक रहा है और ठेकेदार महीनों से कार्यालय के चक्कर काट रहे हैं।
पाइप जमीन में, भुगतान मेज के नीचे?
ग्रामीण क्षेत्रों में पाइपलाइन बिछ चुकी है, टंकियां बन चुकी हैं, कनेक्शन भी कई जगह पूरे हो चुके हैं—लेकिन भुगतान फाइलों में अटका पड़ा है।
एक ठेकेदार ने नाम न छापने की शर्त पर बताया—
“काम हमने अपनी जमीन गिरवी रखकर किया। अब भुगतान के लिए रोज़ दफ्तर के चक्कर लगा रहे हैं। हर बार नया नियम बता दिया जाता है।”
दूसरे ठेकेदार का कहना है—
“साहब को पानी की गुणवत्ता से ज्यादा फाइल की ‘सजावट’ में रुचि है।”
ठेकेदार बने ‘भिखारी’, अधिकारी बने ‘महाराजा’?
विभागीय गलियारों में चर्चा है कि जिन ठेकेदारों ने करोड़ों के कार्य किए, वे आज आर्थिक संकट में हैं। बैंक ऋण, मजदूरों का भुगतान, सप्लायर का दबाव—सब कुछ सिर पर है।
लेकिन विभागीय रवैया ऐसा है मानो विकास नहीं, दरबार चल रहा हो।
कई लोगों का आरोप है कि नियमों की आड़ में फाइलों को रोका जाता है और फिर “समझदारी” का रास्ता सुझाया जाता है।
यदि ये आरोप सही हैं, तो यह केवल भ्रष्टाचार नहीं बल्कि प्रधानमंत्री की योजना के साथ सीधा विश्वासघात है।
आखिर किसका वरदहस्त?
सबसे बड़ा सवाल यही है—
आखिर प्रदीप खालको को इतना संरक्षण किसका प्राप्त है?
एक अधिकारी खुलेआम प्रधानमंत्री की ड्रीम योजना को धीमा कर दे, ठेकेदार परेशान हों, ग्रामीणों तक पानी न पहुंचे—और फिर भी कार्रवाई न हो?
क्या मंत्रालय स्तर पर कोई बड़ा संरक्षण है?
क्या विभागीय राजनीति के कारण सब कुछ जानते हुए भी चुप्पी साधी गई है?
या फिर “कमीशन के कनेक्शन” वास्तव में ऊपर तक जुड़े हुए हैं?
इन सवालों के जवाब अब जनता मांग रही है।
प्यासी जनता, लाचार सिस्टम
खैरागढ़, छुईखदान और गंडई क्षेत्र के कई गांवों में लोग अब भी पानी के लिए जूझ रहे हैं। गर्मी बढ़ रही है, जल संकट गहरा रहा है, लेकिन फाइलों में योजना “वाष्पीकरण” का शिकार होती दिख रही है।
ग्रामीणों का कहना है कि सरकारी योजनाएं कागजों में तेज चलती हैं, जमीन पर नहीं।
महिलाएं अब भी दूर से पानी ला रही हैं, जबकि योजना का उद्देश्य यही समस्या खत्म करना था।
प्रशासन कब जागेगा?
यदि किसी अधिकारी पर इतने गंभीर आरोप लगातार उठ रहे हैं, तो निष्पक्ष जांच क्यों नहीं?
क्या जिला प्रशासन, संभागीय अधिकारी और मंत्रालय इस पूरे मामले की स्वतंत्र जांच कराएंगे?
क्या जल जीवन मिशन की समीक्षा होगी?
क्या भुगतान अटकाने और तकनीकी अड़चन के नाम पर चल रहे कथित खेल का खुलासा होगा?
या फिर यह “वसूली एक्सप्रेस” ऐसे ही चलती रहेगी?
सीधा सवाल
साहब!
प्रधानमंत्री की योजना को फ्लॉप करने का यह अधिकार आपको किसने दिया?
जनता प्यासी है।
ठेकेदार बर्बाद हैं।
सिस्टम लाचार है।
लेकिन यदि “प्रतिशत” तय है, तो विकास कैसे होगा?
अंतिम चुटकी
खैरागढ़ में लोग अब मजाक में कहते हैं—
“साहब के दफ्तर में नल से पानी नहीं, नियम टपकते हैं…
और भुगतान तभी होता है जब मौसम अनुकूल हो जाए!”
अब देखना यह है कि शासन इस मामले में कार्रवाई करता है या फिर “हर घर जल” मिशन, कुछ लोगों के लिए सिर्फ “हर फाइल कमीशन” बनकर रह जाएगा।
(B4News इस मामले पर लगातार निगरानी बनाए हुए है। यदि आपके पास भी इस विषय से जुड़ी जानकारी है, हमें भेजें।)

