🗞️ B4NEWS | विशेष कवर रिपोर्ट
⚖️ न्याय | साक्ष्य | संवेदनशीलता
🔴 छात्रा से दुष्कर्म मामला
हाईकोर्ट ने बदला निचली अदालत का फैसला, मिशन स्कूल के फादर को किया दोषमुक्त
📍 बिलासपुर | छत्तीसगढ़
📌 मुख्य बिंदु (Highlights)
⚖️ हाईकोर्ट ने निचली अदालत का फैसला पलटा
🧑⚖️ चीफ जस्टिस की अगुवाई वाली डिवीजन बेंच का निर्णय
🧬 मेडिकल व वैज्ञानिक साक्ष्यों को माना निर्णायक
⛪ मिशन स्कूल के फादर को दोषमुक्त
🚨 अन्य दो आरोपियों को 7-7 साल की सजा बरकरार
🕊️ न्यायिक प्रक्रिया में आत्म-सुधार की मिसाल
🧑⚖️ कौन-सी बेंच ने सुनाया फैसला
यह मामला की डिवीजन बेंच के समक्ष सुना गया।
👩⚖️👨⚖️ पीठ में शामिल थे:
- न्यायमूर्ति रमेश सिन्हा
मुख्य न्यायाधीश, छत्तीसगढ़ हाईकोर्ट - न्यायमूर्ति रविंद्र कुमार अग्रवाल
न्यायाधीश, छत्तीसगढ़ हाईकोर्ट
👉 दोनों न्यायाधीशों ने मामले के हर दस्तावेज़, मेडिकल रिपोर्ट और वैज्ञानिक साक्ष्य का गहन परीक्षण किया।
📖 मामले की पृष्ठभूमि
यह मामला कोरिया जिले के सरभोका स्थित ज्योति मिशन स्कूल हॉस्टल से जुड़ा है।
वर्ष 2015 में कक्षा चौथी में पढ़ने वाली 9 वर्षीय छात्रा के साथ दुष्कर्म का आरोप सामने आया था।
📌 निचली अदालत ने:
- मिशन स्कूल के फादर को दोषी ठहराया
- अन्य दो आरोपियों को भी सजा सुनाई
🔍 हाईकोर्ट में क्या बदला
हाईकोर्ट ने निचली अदालत के निर्णय की दोबारा समीक्षा की और पाया कि:
🧬 मेडिकल रिपोर्ट (डॉ. कलावती पटेल) में
- पीड़िता के निजी अंगों पर गंभीर चोट व सूजन की पुष्टि
- कपड़ों पर मानव शुक्राणु पाए जाने का उल्लेख
🔬 एफएसएल रिपोर्ट ने
- अपराध होने की पुष्टि की
⚖️ लेकिन कोर्ट ने यह भी स्पष्ट किया कि:
बलात्कार के मामलों में पीड़िता की गवाही महत्वपूर्ण होती है,
परंतु उसे स्वतंत्र वैज्ञानिक साक्ष्यों के साथ संतुलन में परखा जाना आवश्यक है।
⚖️ हाईकोर्ट का फैसला
⛪ मुख्य आरोपी (मिशन स्कूल फादर)
- आईपीसी की धारा 376(2) और पॉक्सो एक्ट के आरोप
- साक्ष्यों में संदेह के आधार पर
➡️ दोषमुक्त (Acquitted)
🚨 अन्य दो आरोपी
- अपराध छिपाने और पीड़िता की मदद न करने के दोषी
- आईपीसी की धारा 119 के तहत
➡️ 7-7 साल का कठोर कारावास
➡️ 5-5 हजार रुपये जुर्माना
🗨️ हाईकोर्ट की अहम टिप्पणी
“न्याय भावनाओं से नहीं,
वैज्ञानिक और कानूनी साक्ष्यों से संचालित होता है।”
कोर्ट ने यह भी कहा कि
किसी भी व्यक्ति को सिर्फ आरोप के आधार पर दोषी नहीं ठहराया जा सकता।
🧠 B4NEWS विश्लेषण
यह फैसला:
- न तो पीड़िता की पीड़ा को नकारता है
- न ही न्याय की आवश्यकता को कमजोर करता है
बल्कि यह दर्शाता है कि
⚖️ न्याय प्रणाली में आत्म-सुधार संभव है — और आवश्यक भी।
🕯️ समापन
संवेदनशील मामलों में न्याय का सबसे कठिन दायित्व यही है—
सत्य तक पहुँचना, बिना पूर्वाग्रह और बिना दबाव।
छत्तीसगढ़ हाईकोर्ट का यह निर्णय
उसी संवैधानिक जिम्मेदारी का उदाहरण है।
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