मुख्यमंत्री विष्णु देव साय के गृह ज़िले से प्रेस की आज़ादी पर बड़ी बहस
रायपुर/रायगढ़/जशपुर | विशेष रिपोर्ट
छत्तीसगढ़ में एक नया विवाद खड़ा हो गया है। मुख्यमंत्री विष्णु देव साय के गृह ज़िले से जुड़ा यह मामला अब प्रदेश की पत्रकार बिरादरी में हलचल मचा रहा है। जनसम्पर्क विभाग की सहायक संचालक नूतन सिदार ने रायगढ़ के ग्रामीण पत्रकार ऋषिकेश मिश्र पर मानहानि का आरोप लगाते हुए एफआईआर, मोबाइल जब्ती और गिरफ्तारी की मांग की है।
विवाद का केंद्र
नूतन सिदार ने पुलिस अधीक्षक रायगढ़ को दिए आवेदन में आरोप लगाया है कि ऋषिकेश मिश्र उनकी तस्वीर और संदेश सोशल मीडिया पर वायरल कर बदनाम कर रहे हैं। इसके आधार पर उन्होंने आईटी एक्ट के तहत कार्रवाई की मांग की है।
मगर सवाल यह है कि –
👉 क्या हर आलोचना को अपराध बताकर दबाया जा सकता है?
👉 क्या अधिकारी अपने पद की आड़ में पत्रकारों और आम लोगों पर कार्रवाई की धमकी देंगे?
मुख्यमंत्री के विभाग पर सवाल
गौरतलब है कि नूतन सिदार जनसम्पर्क विभाग में कार्यरत हैं और यह विभाग सीधे मुख्यमंत्री विष्णु देव साय के पास है। ऐसे में यह मामला अब व्यक्तिगत विवाद से आगे बढ़कर मुख्यमंत्री की छवि और उनके शासन की कार्यशैली से जुड़ गया है।
विपक्ष और पत्रकार संगठनों का आरोप है कि मुख्यमंत्री के गृह ज़िले में ही पत्रकारों की आवाज़ दबाई जा रही है।
प्रेस की आज़ादी बनाम अफसरशाही
पत्रकार संगठनों ने इस प्रकरण की कड़ी निंदा करते हुए कहा –
👉 “यदि पत्रकार को सच्चाई लिखने पर एफआईआर और गिरफ्तारी का डर दिखाया जाएगा, तो लोकतंत्र का चौथा स्तंभ ही खतरे में पड़ जाएगा।”
आलोचना सहने के बजाय एफआईआर दर्ज कराने की मांग को अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता पर हमला माना जा रहा है।
विपक्ष का हमला
जैसे ही मामला सार्वजनिक हुआ, विपक्षी दलों ने इसे बड़ा मुद्दा बना लिया है। उनका कहना है कि मुख्यमंत्री के विभाग के अधिकारी पत्रकारों को दबाने की कोशिश कर रहे हैं, जिससे “पारदर्शी शासन” की छवि धूमिल हो रही है।
जनता के सवाल
क्या सोशल मीडिया पर आलोचना अपराध है?
क्या अधिकारी अपनी छवि बचाने के लिए पुलिस का सहारा लेंगे?
क्या नूतन सिदार का यह कदम पद के दुरुपयोग की श्रेणी में आता है?
क्या अब पत्रकारिता करना ही अपराध माना जाएगा?
संगठनों की चेतावनी
स्थानीय पत्रकार संगठनों ने साफ कहा है कि यदि प्रशासन ने इस मामले में पक्षपातपूर्ण कार्रवाई की तो ज़बरदस्त विरोध होगा।
नतीजा
यह विवाद अब सिर्फ एक अफसर और पत्रकार तक सीमित नहीं रहा। यह तय करेगा कि छत्तीसगढ़ में पत्रकारिता स्वतंत्र रहेगी या अफसरशाही के दबाव में दब जाएगी।
अब निगाहें पुलिस पर हैं कि वह जनता की आवाज़ का सम्मान करती है या अधिकारी के दबाव में आती है।




